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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
इस जनम में । राजुला शाह
अचरज हो तुम
एक दु:स्वप्न से जग
कमरे में
अलस्सुबह
परदे उड़ाते आती
हवा-सा अचरज।
इसके आगे मगर
मुझे कुछ याद नहीं
जगता हूँ तो स्वप्न भुला जाता है
सोता हूँ तो यह संसार
जाने कहाँ बिला जाता है
कभी यही भूल जाता हूँ
कि जागा हूँ या सो रहा
फिर भी
इस जनम में
तुमसे ही
बाकी सब
अपनी जगह पर है
इसलिए
मैं कहीं भी रहूँ
तुम यहीं रहना
मैं कुछ भी कहूँ
तुम यही कहना
मैं हूँ
मैं रहूँगी।