Pratidin Ek Kavita

नई भूख | हेमंत देवलेकर 

भूख से तड़पते हुए भी
 आदमी रोटी नहीं  मांगता
वह चिल्लाता है 'गति...गति!!
तेज़...और तेज़...
इससे तेज़ क्यों नहीं'
कभी न स्थगित होने वाली वासना है गति
हमारे पास डाकिये की कोई स्मृति नहीं बची।
दुनिया के किसी भी कोने में
पलक झपकते पहुँच रहा है सब कुछ
सारी आधुनिकता इस वक़्त लगी है
समय बचाने में - 
जो स्वयं ब्लैक होल है।
हो सकता है किसी रोज़
हम बना लें समय भी
मगर क्या तब भी
होगा हमारे पास इतना समय भी कि
किसी उल्टे पड़े छटपटाते कीड़े को सीधा कर सकें ।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

नई भूख | हेमंत देवलेकर

भूख से तड़पते हुए भी
आदमी रोटी नहीं मांगता
वह चिल्लाता है 'गति...गति!!
तेज़...और तेज़...
इससे तेज़ क्यों नहीं'
कभी न स्थगित होने वाली वासना है गति
हमारे पास डाकिये की कोई स्मृति नहीं बची।
दुनिया के किसी भी कोने में
पलक झपकते पहुँच रहा है सब कुछ
सारी आधुनिकता इस वक़्त लगी है
समय बचाने में -
जो स्वयं ब्लैक होल है।
हो सकता है किसी रोज़
हम बना लें समय भी
मगर क्या तब भी
होगा हमारे पास इतना समय भी कि
किसी उल्टे पड़े छटपटाते कीड़े को सीधा कर सकें ।