Pratidin Ek Kavita

ग़ुस्सा |  गुलज़ार

बूँद बराबर बौना-सा भन्नाकर लपका
पैर के अँगूठे से उछला

टख़नों से घुटनों पर आया
पेट पे कूदा

नाक पकड़ कर
फन फैला कर सर पे चढ़ गया ग़ुस्सा!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

ग़ुस्सा | गुलज़ार

बूँद बराबर बौना-सा भन्नाकर लपका
पैर के अँगूठे से उछला

टख़नों से घुटनों पर आया
पेट पे कूदा

नाक पकड़ कर
फन फैला कर सर पे चढ़ गया ग़ुस्सा!