Pratidin Ek Kavita

अन्त में | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
सुनना चाहता हूँ

एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो।

अन्यथा
इसके पूर्व कि

मेरा हर कथन
हर मंथन

हर अभिव्यक्ति
शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,

उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ
जो मृत्यु है।

‘वह बिना कहे मर गया’
यह अधिक गौरवशाली है

यह कहे जाने से—
‘कि वह मरने के पहले

कुछ कह रहा था
जिसे किसी ने सुना नहीं।’

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

अन्त में | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
सुनना चाहता हूँ

एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो।

अन्यथा
इसके पूर्व कि

मेरा हर कथन
हर मंथन

हर अभिव्यक्ति
शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,

उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ
जो मृत्यु है।

‘वह बिना कहे मर गया’
यह अधिक गौरवशाली है

यह कहे जाने से—
‘कि वह मरने के पहले

कुछ कह रहा था
जिसे किसी ने सुना नहीं।’