Pratidin Ek Kavita

एक बहुत ही तन्मय चुप्पी | भवानीप्रसाद मिश्र

एक बहुत ही तन्मय चुप्पी ऐसी

जो माँ की छाती में लगाकर मुँह
चूसती रहती है दूध

मुझसे चिपककर पड़ी है
और लगता है मुझे

यह मेरे जीवन की
लगभग सबसे निविड़ ऐसी घड़ी है

जब मैं दे पा रहा हूँ
स्वाभाविक और सुख के साथ अपने को

किसी अनोखे ऐसे सपने को
जो अभी-अभी पैदा हुआ है

और जो पी रहा है मुझे
अपने साथ-साथ

जो जी रहा है मुझे!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

एक बहुत ही तन्मय चुप्पी | भवानीप्रसाद मिश्र

एक बहुत ही तन्मय चुप्पी ऐसी

जो माँ की छाती में लगाकर मुँह
चूसती रहती है दूध

मुझसे चिपककर पड़ी है
और लगता है मुझे

यह मेरे जीवन की
लगभग सबसे निविड़ ऐसी घड़ी है

जब मैं दे पा रहा हूँ
स्वाभाविक और सुख के साथ अपने को

किसी अनोखे ऐसे सपने को
जो अभी-अभी पैदा हुआ है

और जो पी रहा है मुझे
अपने साथ-साथ

जो जी रहा है मुझे!