Subscribe
Share
Share
Embed
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
उतरा ज्वार | दूधनाथ सिंह
उतरा ज्वार
जल
मैला
लहरें
गयीं क्षितिज के पार
काला सागर
अन्धी आँखें फाड़
ताक रहा है
गहन नीलिमा
बुझे हुए तारे
कचपच-कचपच
ढूँढ़ रहे हैं
ठौर
मैं हूँ मैं हूँ
यह दृश् ।
खोज रहा हूँ
बंकिम चाँद
क्षितिज किनारे
मन में
जो अदृश्य है ।