कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
किताब के फूल । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’
जब भी
अपने प्रेमिका को
देना गुलाब
देना संग किताबें भी
ताकी उन किताबों में
उस गुलाब को संजो सके
तुम्हारे दिए खतों को
उस किताब के पन्नों में छुपा सके
और आजीवन के लिए
इस पल को अपने स्मृति में सहेज सके
वो जब-जब उस किताब को पढ़े
तो उस गुलाब की ख़ुश्बू
तुम्हारे होने का साक्षी बनेंगी
और उसे यादों में ले जाएंगी
जो उसे पुलकित करेंगें
ये किताबें
तुम्हारे प्रेम को जीवित रखने का
कर्तव्य निभाती रहेगी
और सहेजे रखेगी तुम्हारे स्मृतियों को
तो जब भी देना गुलाब
देना संग किताबें भी..!