Pratidin Ek Kavita

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं।  विनोद कुमार शुक्ल

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं
और पूरा आकाश देख लेते हैं

सबके हिस्से का आकाश
पूरा आकाश है।

अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं
और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं

सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।
अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं

वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ
अख़बार पढ़ रहा है

और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।
सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।

अपने हिस्से की भूख के साथ
सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात

बाज़ार में जो दिख रही है
तंदूर में बनती हुई रोटी

सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।
जो सबकी घड़ी में बज रहा है

वह सबके हिस्से का समय नहीं है।
इस समय।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं। विनोद कुमार शुक्ल

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं
और पूरा आकाश देख लेते हैं

सबके हिस्से का आकाश
पूरा आकाश है।

अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं
और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं

सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।
अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं

वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ
अख़बार पढ़ रहा है

और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।
सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।

अपने हिस्से की भूख के साथ
सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात

बाज़ार में जो दिख रही है
तंदूर में बनती हुई रोटी

सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।
जो सबकी घड़ी में बज रहा है

वह सबके हिस्से का समय नहीं है।
इस समय।