Pratidin Ek Kavita

जो शिलाएँ तोड़ते हैं । केदारनाथ अग्रवाल

ज़िंदगी को

वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,
जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!

ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं,

लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं।
यज्ञ को इस शक्ति श्रम के

श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
ज़िंदगी को

वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं,
शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!

ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो प्रलय को रोकते हैं,

रक्त से रंजित धरा पर शांति का पथ खोजते हैं।
यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के

श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूँगा।

ख़ूबसूरत ज़िंदगी की नौजवानी भोग लूँगा।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

जो शिलाएँ तोड़ते हैं । केदारनाथ अग्रवाल

ज़िंदगी को

वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,
जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!

ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं,

लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं।
यज्ञ को इस शक्ति श्रम के

श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
ज़िंदगी को

वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं,
शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!

ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो प्रलय को रोकते हैं,

रक्त से रंजित धरा पर शांति का पथ खोजते हैं।
यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के

श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूँगा।

ख़ूबसूरत ज़िंदगी की नौजवानी भोग लूँगा।