Pratidin Ek Kavita

अजनबी शाम | जौन एलिया

धुँद छाई हुई है झीलों पर
उड़ रहे हैं परिंद टीलों पर

सब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़
बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़


अपने गल्लों को ले के चरवाहे
सरहदी बस्तियों में जा पहुँचे


दिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँ
अजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँ

नशेमनों: आश्रय रुख़: दिशा
गल्लों: झुण्ड


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

अजनबी शाम | जौन एलिया

धुँद छाई हुई है झीलों पर
उड़ रहे हैं परिंद टीलों पर

सब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़
बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़

अपने गल्लों को ले के चरवाहे
सरहदी बस्तियों में जा पहुँचे

दिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँ
अजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँ

नशेमनों: आश्रय रुख़: दिशा
गल्लों: झुण्ड