Pratidin Ek Kavita

बेचैन चील।  गजानन माधव मुक्तिबोध

बेचैन चील!!
उस-जैसा मैं पर्यटनशील

प्यासा-प्यासा,
देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील

या पानी का कोरा झाँसा
जिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब

इनकार एक सूना!!


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बेचैन चील। गजानन माधव मुक्तिबोध

बेचैन चील!!
उस-जैसा मैं पर्यटनशील

प्यासा-प्यासा,
देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील

या पानी का कोरा झाँसा
जिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब

इनकार एक सूना!!