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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
इंतज़ार । पद्मा सचदेव
फागुन की डयौढ़ी के आगे
लग गया पहाड़ सूखी पत्तियों का
कोई पत्ता सीधा कोई गोल-सा हुआ पड़ा
कोई धीरे-धीरे ले रहा है साँस
कोई लगता है यूँ बिल्कुल मरा-सा
टहनियों पर नए फूल
आने को आतुर बड़े
हरी टहनियों के ऊपर जैसे हों मोती जड़े
खुलेगी जब कली आ ही जाएँगे
मुट्ठी बंद, बंद आँख, बंद होंठ
सब ही तो खुल जाएँगे
छोटे-छोटे हाथ पाँव, बाँह और छोटा-सा पेट
खिलेगी पूरी बहार
फागुन भी करता इसी का इंतज़ार