Pratidin Ek Kavita

बेरोज़गार हम / शांति सुमन

पिता किसान अनपढ़ माँ
बेरोज़गार हैं हम
जाने राम कहाँ से होगी
घर की चिन्ता कम

आँगन की तुलसी-सी बढ़ती
घर में बहन कुमारी
आसमान में चिड़िया-सी
उड़ती इच्छा सुकुमारी

छोटा भाई दिल्ली जाने का भरता है दम ।

पटवन के पैसे होते
तो बिकती नहीं ज़मीन
और तकाज़े मुखिया के
ले जाते सुख को छीन

पतले होते मेड़ों पर आँखें जाती है थम ।

जहाँ-तहाँ फटने को है
साड़ी पिछली होली की
झुकी हुई आँखें लगती हैं
अब करुणा की बोली सी
समय-साल ख़राब टँगे रहते बनकर परचम ।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बेरोज़गार हम / शांति सुमन

पिता किसान अनपढ़ माँ
बेरोज़गार हैं हम
जाने राम कहाँ से होगी
घर की चिन्ता कम

आँगन की तुलसी-सी बढ़ती
घर में बहन कुमारी
आसमान में चिड़िया-सी
उड़ती इच्छा सुकुमारी

छोटा भाई दिल्ली जाने का भरता है दम ।

पटवन के पैसे होते
तो बिकती नहीं ज़मीन
और तकाज़े मुखिया के
ले जाते सुख को छीन

पतले होते मेड़ों पर आँखें जाती है थम ।

जहाँ-तहाँ फटने को है
साड़ी पिछली होली की
झुकी हुई आँखें लगती हैं
अब करुणा की बोली सी
समय-साल ख़राब टँगे रहते बनकर परचम ।