Pratidin Ek Kavita

ओ चिड़िया! ।  ऐश्वर्या तिवारी 

ओ चिड़िया
आ बैठ खिड़की पे
मैं मरीज़ इस दुनियादारी का
देखा नहीं है आसमान का रंग अरसे से
आ बैठ संग मेरे
बता मुझे क्या रंग बटा है ऊपर-ऊपर?
क्या इतनी ही उलझन है उधर?
मैं क़ैदी हूँ कितने बंधन का
क्या जानूँ जिसे छू लूँ
उलझ जाए वो भी दो-एक डोर में।
दिल का बीमार हूँ इतना कि
बाज़ार से ले आपा था पिंजरा,
वो कहते हैं
जिससे होता है प्रेम उसे रखते हैं संग हमेशा
रखा है अब भी वो किसी कोने में
जिसकी सलाखों पर लिखा है बाज़ारू भाषा में - प्रेम।
आ बैठ तू फिर भी
छोड़ तमाम दुनिया की भाषा-परिभाषा
छोड़ यह पिंजरा-विंजरा
मैं डाल दूंगा उसमें अपना जूता
तू बता-
कैसा है सब वहाँ
जहाँ कहीं से आई है तू?

आ मुझसे बतिया
इसी बहाने अरसों से पड़ी बंद खिड़की खुल जाएगी
फिर कौन है जो आकर यहाँ बैठेगी गाएगी
आ मुझे तनिक प्रेम करने दे
आ कि जीवन में जीवन रस भरने दे
मैं नहीं कहता तेरा यही ठिकाना है
आ कि तुझे एक दिन उड़ ही जाना है।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

ओ चिड़िया! । ऐश्वर्या तिवारी

ओ चिड़िया
आ बैठ खिड़की पे
मैं मरीज़ इस दुनियादारी का
देखा नहीं है आसमान का रंग अरसे से
आ बैठ संग मेरे
बता मुझे क्या रंग बटा है ऊपर-ऊपर?
क्या इतनी ही उलझन है उधर?
मैं क़ैदी हूँ कितने बंधन का
क्या जानूँ जिसे छू लूँ
उलझ जाए वो भी दो-एक डोर में।
दिल का बीमार हूँ इतना कि
बाज़ार से ले आपा था पिंजरा,
वो कहते हैं
जिससे होता है प्रेम उसे रखते हैं संग हमेशा
रखा है अब भी वो किसी कोने में
जिसकी सलाखों पर लिखा है बाज़ारू भाषा में - प्रेम।
आ बैठ तू फिर भी
छोड़ तमाम दुनिया की भाषा-परिभाषा
छोड़ यह पिंजरा-विंजरा
मैं डाल दूंगा उसमें अपना जूता
तू बता-
कैसा है सब वहाँ
जहाँ कहीं से आई है तू?

आ मुझसे बतिया
इसी बहाने अरसों से पड़ी बंद खिड़की खुल जाएगी
फिर कौन है जो आकर यहाँ बैठेगी गाएगी
आ मुझे तनिक प्रेम करने दे
आ कि जीवन में जीवन रस भरने दे
मैं नहीं कहता तेरा यही ठिकाना है
आ कि तुझे एक दिन उड़ ही जाना है।