Pratidin Ek Kavita

विस्मृति।  सुषमा कुमारी 

हम दूसरी दुनिया के
चौथे, पाँचवे या सबसे निचले दर्जे के
बचे हुए मुट्ठी भर अनाज हैं,
आधे गेहूँ और आधे घून की तरह
बची हुई हमारी नियति
जातें में पीसने को तैयार है!
गेहूँ है, घून है
चक्की है, आटा है,
भूख अब भी बैठी है आँत में
हवा बदली है, मौसम बिगड़ा है।

अख़बारों में युद्ध अब सबसे बड़ा मुद्दा नहीं,
चूल्हे का सवाल
इन दिनों सबसे बड़ा सवाल है!
और चूहेदानी में फंसे
रोटी के टुकड़े सबसे बड़ा जाल है!
पत्थर से आग
और आग से चूल्हा जलाने वाले लोग
इन दिनों विस्मृति का शिकार हैं!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

विस्मृति। सुषमा कुमारी

हम दूसरी दुनिया के
चौथे, पाँचवे या सबसे निचले दर्जे के
बचे हुए मुट्ठी भर अनाज हैं,
आधे गेहूँ और आधे घून की तरह
बची हुई हमारी नियति
जातें में पीसने को तैयार है!
गेहूँ है, घून है
चक्की है, आटा है,
भूख अब भी बैठी है आँत में
हवा बदली है, मौसम बिगड़ा है।

अख़बारों में युद्ध अब सबसे बड़ा मुद्दा नहीं,
चूल्हे का सवाल
इन दिनों सबसे बड़ा सवाल है!
और चूहेदानी में फंसे
रोटी के टुकड़े सबसे बड़ा जाल है!
पत्थर से आग
और आग से चूल्हा जलाने वाले लोग
इन दिनों विस्मृति का शिकार हैं!