Pratidin Ek Kavita

धरती । शरद बिलौरे

दो बरस की नीलू
आसमान तकती है

पापा से कहती है
पापा मुझे आसमान चाहिए।

पापा ने कभी आसमान जैसी चीज़
अपने बाप से नहीं माँगी

एक बार तारे ज़रूर माँगे थे।
पापा डरे हुए हैं सोचते हैं

मैं धरती पर खेल कर बड़ा हुआ
क्या नीलू आसमान ताक कर बड़ी होगी

और यह
कि मैंने अपने बाप से और

नीलू ने मुझसे
धरती क्यों नहीं माँगी।

क्या सचमुच धरती
बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

धरती । शरद बिलौरे

दो बरस की नीलू
आसमान तकती है

पापा से कहती है
पापा मुझे आसमान चाहिए।

पापा ने कभी आसमान जैसी चीज़
अपने बाप से नहीं माँगी

एक बार तारे ज़रूर माँगे थे।
पापा डरे हुए हैं सोचते हैं

मैं धरती पर खेल कर बड़ा हुआ
क्या नीलू आसमान ताक कर बड़ी होगी

और यह
कि मैंने अपने बाप से और

नीलू ने मुझसे
धरती क्यों नहीं माँगी।

क्या सचमुच धरती
बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं!