Pratidin Ek Kavita

घर | मोहन राणा

धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत

धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता
धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात

धन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलते
धन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुख

उसकी स्मृति को
धन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँ

जो बन जाती टॉकीज़,
आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा में

धन्य यह साँस,
मैं कैसे भूल सकता हूँ घर

और कोने पर धारे का पानी

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

घर | मोहन राणा

धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत

धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता
धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात

धन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलते
धन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुख

उसकी स्मृति को
धन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँ

जो बन जाती टॉकीज़,
आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा में

धन्य यह साँस,
मैं कैसे भूल सकता हूँ घर

और कोने पर धारे का पानी