Pratidin Ek Kavita

सीढ़ी । पद्मजा शर्मा

जो किसी को
सीढ़ी बनाकर
ऊपर चढ़ रहे हैं
वह मुझसे कह रहे हैं
तुम कमज़ोर हो
कब से खड़ी हो
बीच रास्ते
हट जाओ
वे नहीं जानते
कि सीढ़ी के हटते ही
वे गिरेंगे
मैं
फिर भी
खड़ी रहूँगी

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

सीढ़ी । पद्मजा शर्मा

जो किसी को
सीढ़ी बनाकर
ऊपर चढ़ रहे हैं
वह मुझसे कह रहे हैं
तुम कमज़ोर हो
कब से खड़ी हो
बीच रास्ते
हट जाओ
वे नहीं जानते
कि सीढ़ी के हटते ही
वे गिरेंगे
मैं
फिर भी
खड़ी रहूँगी