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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
सफ़र के साथी । नताशा
वे मेरे कोई नहीं थे
जिनका रह गया पानी उधार मुझ पर
उन कंधों की स्मृति शेष है
जिन पर मेरी नींद विदा हो गई है
उन पर रह गया उधार
मेरे चुंबन का स्पर्श
बीच रस्ते में जिनसे
बिछड़ जाना पड़ा था
उन चेहरों को निहारना था
जिन्होंने लंबे सफ़र में
मेरी भूख को बाँटा
जिनके संबोधन के सूत्र
ध्वनि में घुल मेरे घर चले आए
मैं कैसे चुकाऊँगी ये कर्ज़
उन अजनबियों के
जो मेरे कोई नहीं थे!