Subscribe
Share
Share
Embed
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
पूरा परिवार एक कमरे में | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी
पूरा परिवार, एक कमरे में
कितने संसार, एक कमरे में।
हो नहीं पाया बड़े सपनों का
छोटा आकार, एक कमरे में।
ज़िक्र दादा की उस हवेली का
सैंकड़ों बार, एक कमरे में।
शोरगुल, नींद, पढ़ाई, टी.वी.
रोज़ तकरार, एक कमरे में।
एक घर, हर किसी की आँखों में
सबका विस्तार, एक कमरे में।