Pratidin Ek Kavita

पेड़ । ओमप्रकाश वाल्मीकि

पेड़
तुम पेड़ उसी वक़्त तक

पेड़ हो,
जब तक ये हरे पत्ते

हिल रहे हैं
तुम्हारी टहनियों पर।

पेड़,
तुम्हारा हरापन उसी वक़्त तक है

जब तक ये पत्ते सही सलामत हैं
तुम्हारी टहनियों पर।

पेड़,
तुम उसी वक़्त तक पेड़ हो,

जब तक ये पत्ते
तुम्हारे साथ हैं।

पत्ते झरते ही
पेड़ नहीं ठूँठ कहलाओगे

जीते जी मर जाओगे!


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

पेड़ । ओमप्रकाश वाल्मीकि

पेड़
तुम पेड़ उसी वक़्त तक

पेड़ हो,
जब तक ये हरे पत्ते

हिल रहे हैं
तुम्हारी टहनियों पर।

पेड़,
तुम्हारा हरापन उसी वक़्त तक है

जब तक ये पत्ते सही सलामत हैं
तुम्हारी टहनियों पर।

पेड़,
तुम उसी वक़्त तक पेड़ हो,

जब तक ये पत्ते
तुम्हारे साथ हैं।

पत्ते झरते ही
पेड़ नहीं ठूँठ कहलाओगे

जीते जी मर जाओगे!