Pratidin Ek Kavita

बारिश । गिरधर राठी

बारिश
जहाँ जोड़ती है

ठीक वहीं तोड़ती है
गुनगुनाती है

अपने-आप
लहराती

हहराती है
अपने-आप

चुप हो जाती है
बरसती रहती है अपने-आप

तुम्हें कुछ नहीं करने देती
...

दीवार है
बारिश हे

बनती और टूटती
टूट-टूट पड़ती

एकांत पर
एकांत

बारिश में (भी)
ढहता नहीं

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बारिश । गिरधर राठी

बारिश
जहाँ जोड़ती है

ठीक वहीं तोड़ती है
गुनगुनाती है

अपने-आप
लहराती

हहराती है
अपने-आप

चुप हो जाती है
बरसती रहती है अपने-आप

तुम्हें कुछ नहीं करने देती
...

दीवार है
बारिश हे

बनती और टूटती
टूट-टूट पड़ती

एकांत पर
एकांत

बारिश में (भी)
ढहता नहीं