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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
भूलना | रचित
कितना भयावह है
भूलने के बाद सिर्फ़ यह याद रहना
कि कुछ भूल गए हैं
उससे भी ज़्यादा पीड़ादायक है यह अनुभूति
कि वह भूला हुआ जब भी याद आएगा
हम जान नहीं पाएँगे कि
यही तो भूले थे किसी उदास दिन।