Pratidin Ek Kavita

थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए | गगन गिल

जैसे मिट्टी में चमकती
किरण सूर्य की
जैसे पानी में स्वाद 
भीगे पत्थर का
जैसे भीगी हुई रेत पर
मछली में तड़पन
थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए
जैसे गूँगे के कंठ में
याद आया गीत
जैसे हल्की-सी साँस
सीने में अटकी
जैसे काँच से चिपटे
कीट में लालसा
जैसे नदी की तह में
डूबी हुई प्यास
थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए | गगन गिल

जैसे मिट्टी में चमकती
किरण सूर्य की
जैसे पानी में स्वाद
भीगे पत्थर का
जैसे भीगी हुई रेत पर
मछली में तड़पन
थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए
जैसे गूँगे के कंठ में
याद आया गीत
जैसे हल्की-सी साँस
सीने में अटकी
जैसे काँच से चिपटे
कीट में लालसा
जैसे नदी की तह में
डूबी हुई प्यास
थोड़ी-सी उम्मीद चाहिए