कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
अभया | अश्विनी
पुरवा सुहानी नहीं, डरावनी है इस बार,
चपला सी दिल दहलाती आती चीत्कार।
वर्षा नहीं, रक्त बरसा है इस बार,
पक्षी उड़ गए पेड़ों से, रिक्त है हर डार।
किसे सुनाती हो दुख अपना, सभी बहरे हैं,
नहीं समझेगा कोई, घाव तुम्हारे कितने गहरे हैं।
पहने मुखौटे घूमते, घिनौने वही सब चेहरे हैं,
अपराधी सत्ता के गलियारों में ही तो ठहरे हैं।
रक्षक बने भक्षक, छाई चारों ओर निराशा,
धन के हाथों बिके हैं सब, किससे करतीं आशा।
याचना नहीं अब रण के लिए तत्पर हो जाओ,
महिषासुर मर्दिनी बन, अपना रौद्र रूप दिखलाओ।