Pratidin Ek Kavita

मिल ही जाएगा कभी | अहमद मुश्ताक़

मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है
वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है

जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे        
ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है        

इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे
और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है

रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए
इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है

दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन 
उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है


 फ़सुर्दा: मुरझाया हुआ
 दर-ओ-बाम: (लाक्षणिक) मकान
  मकीं: मकान में रहने वाला 


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मिल ही जाएगा कभी | अहमद मुश्ताक़

मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है
वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है

जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे
ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है

इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे
और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है

रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए
इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है

दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन
उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है

फ़सुर्दा: मुरझाया हुआ
दर-ओ-बाम: (लाक्षणिक) मकान
मकीं: मकान में रहने वाला