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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
सीधी सी बात। पाब्लो नेरुदा
(अनुवाद: मंगलेश डबराल)
शक्ति होती है मौन (पेड़ कहते हैं मुझसे)
और गहराई भी (कहती हैं जड़ें)
और पवित्रता भी (कहता है अन्न)
पेड़ ने कभी नहीं कहा:
‘मैं सबसे ऊंचा हूँ!’
जड़ ने कभी नहीं कहा:
‘मैं बेहद गहराई से आयी हूँ!’
और रोटी कभी नहीं बोली:
'दुनिया में क्या है मुझसे अच्छा'