Pratidin Ek Kavita

युग्म | विवेक निराला 
  
एक समय में रहे होंगे कम-से-कम-दो 
जितने कि आवश्यक हैं सृष्टि के लिए।

दो आवाज़ें भी रही होंगी कम-से-कम 
एक सन्नाटे की 
एक अँधेरे की।

अँधेरा भी दो तरह का 
रहा होगा अवश्य 
एक भीतर का 
दूसरा बाहर का।

जल-थल 
सर्दी-गर्मी 
दिन-रात 
युग्म में ही रहा होगा जीवन
सुख-दुख से भरा हुआ।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

युग्म | विवेक निराला

एक समय में रहे होंगे कम-से-कम-दो
जितने कि आवश्यक हैं सृष्टि के लिए।

दो आवाज़ें भी रही होंगी कम-से-कम
एक सन्नाटे की
एक अँधेरे की।

अँधेरा भी दो तरह का
रहा होगा अवश्य
एक भीतर का
दूसरा बाहर का।

जल-थल
सर्दी-गर्मी
दिन-रात
युग्म में ही रहा होगा जीवन
सुख-दुख से भरा हुआ।