Pratidin Ek Kavita

ओ पृथ्वी तुम्हारा घर कहाँ है | केदारनाथ सिंह 

जीने के अथाह खनिजों से लदी
और प्रजनन की अपार इच्छाओं से भरी हुई
ओ पृथ्वी
ओ किसी पहले आदमी की
पहली गोल लिट्टी
कहीं अपने ही भीतर के कंडे पर
पकती हुई
ओ अग्निगर्भा
ओ भूख
ओ प्यास
ओ हल्दी
ओ घास
ओ एक रंगारंग भव्य नश्वरता
जिसकी हर आवृत्ति में
वही उदग्रता
वही पहलापन
ओ पृथ्वी
ओ मेरी हमरक़्स
तुम्हारा घर कहाँ है!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

ओ पृथ्वी तुम्हारा घर कहाँ है | केदारनाथ सिंह

जीने के अथाह खनिजों से लदी
और प्रजनन की अपार इच्छाओं से भरी हुई
ओ पृथ्वी
ओ किसी पहले आदमी की
पहली गोल लिट्टी
कहीं अपने ही भीतर के कंडे पर
पकती हुई
ओ अग्निगर्भा
ओ भूख
ओ प्यास
ओ हल्दी
ओ घास
ओ एक रंगारंग भव्य नश्वरता
जिसकी हर आवृत्ति में
वही उदग्रता
वही पहलापन
ओ पृथ्वी
ओ मेरी हमरक़्स
तुम्हारा घर कहाँ है!