कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
आवारा के दाग़ चाहिए | देवी प्रसाद मिश्र
दो वक़्तों का कम से कम तो भात चाहिए
गात चाहिए जो न काँपे
सत्ता के सम्मुख जो कह दूँ
बात चाहिए कि छिप जाने को रात चाहिए
पूरी उम्र लगें कितने ही दाग़ चाहिए
मात चाहिए बहुत इश्क़ में फ़ाग चाहिए
राग चाहिए साथ चाहिए
उठा हुआ वह हाथ चाहिए नाथ चाहिए नहीं
कि अपना माथ चाहिए झुके नहीं जो
राख चाहिए इच्छाओं की भूख लगी है
साग चाहिए बाग़ चाहिए सोना है अब
लाग चाहिए बहुत विफल का भाग चाहिए
आवारा के दाग़ चाहिए बहुत दिनों तक गूँजेगी जो
आह चाहिए जाकर कहीं लौटकर आती राह चाहिए
इश्क़ होय तो आग चाहिए।