Pratidin Ek Kavita

ख़ुद से | रेणु कश्यप

गिरो कितनी भी बार मगर 
उठो तो यूँ उठो 
कि पंख पहले से लंबे हों 
और उड़ान न सिर्फ़ ऊँची पर गहरी भी 
हारना और डरना रहे 
बस हिस्सा भर 
एक लंबी उम्र का 
और उम्मीद 
और भरपूर मोहब्बत 
हों परिभाषाएँ 
जागो तो सुबह शाँत हो 
ठीक जैसे मन भी हो 
कि ख़ुद को देखो तो चूमो माथा 
गले लगो ख़ुद से चिपककर 
कि कब से 
कितने वक़्त से, 
सदियों से बल्कि 
उधार चल रहा है अपने आपका 
प्यार का जब हो ज़िक्र 
तो सबसे पहला नाम 
ख़ुद का याद आए 
दुख का हो तो जैसे 
किसी भूली भटकी चीज़ का 
माँ का हो ज़िक्र तो बस 
चेहरे का चूमना याद आए 
बेतहाशा, एक साँस में बीसों बार 
ग़लतियों और माफ़ियों को भूल जाएँ 
ठीक वैसे ही 
जैसे लिखकर मिटाया हो 
कोई शब्द या लकीर। 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

ख़ुद से | रेणु कश्यप

गिरो कितनी भी बार मगर
उठो तो यूँ उठो
कि पंख पहले से लंबे हों
और उड़ान न सिर्फ़ ऊँची पर गहरी भी
हारना और डरना रहे
बस हिस्सा भर
एक लंबी उम्र का
और उम्मीद
और भरपूर मोहब्बत
हों परिभाषाएँ
जागो तो सुबह शाँत हो
ठीक जैसे मन भी हो
कि ख़ुद को देखो तो चूमो माथा
गले लगो ख़ुद से चिपककर
कि कब से
कितने वक़्त से,
सदियों से बल्कि
उधार चल रहा है अपने आपका
प्यार का जब हो ज़िक्र
तो सबसे पहला नाम
ख़ुद का याद आए
दुख का हो तो जैसे
किसी भूली भटकी चीज़ का
माँ का हो ज़िक्र तो बस
चेहरे का चूमना याद आए
बेतहाशा, एक साँस में बीसों बार
ग़लतियों और माफ़ियों को भूल जाएँ
ठीक वैसे ही
जैसे लिखकर मिटाया हो
कोई शब्द या लकीर।