Pratidin Ek Kavita

फूले कदंब । नागार्जुन

फूले कदंब
टहनी-टहनी में कंदुक सम झूले कदंब

फूले कदंब।
सावन बीता

बादल का कोप नहीं रीता
जाने कब से तू बरस रहा

ललचाई आँखों से नाहक
जाने कब से तू तरस रहा

मन कहता है,छू ले कदंब
फूले कदंब

फूले कदंब।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

फूले कदंब । नागार्जुन

फूले कदंब
टहनी-टहनी में कंदुक सम झूले कदंब

फूले कदंब।
सावन बीता

बादल का कोप नहीं रीता
जाने कब से तू बरस रहा

ललचाई आँखों से नाहक
जाने कब से तू तरस रहा

मन कहता है,छू ले कदंब
फूले कदंब

फूले कदंब।