कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए । मोहम्मद अल्वी
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए
उस की तस्वीर हटा दी जाए
ढूँडने में भी मज़ा आता है
कोई शय रख के भुला दी जाए
नाम लिख लिख के तिरा काग़ज़ पर
रौशनाई भी गिरा दी जाए
नाव काग़ज़ की बना कर उस को
बहते पानी में बहा दी जाए
रात को चुपके से इक इक घर की
क्यूँ न ज़ंजीर लगा दी जाए
नींद में चौंक पड़ेगा कोई
आओ उस दर पे सदा दी जाए
आख़िरी साँस महक जाएगी
उस के दामन की हवा दी जाए
सब के सब याद चले आते हैं
आज किस किस को दुआ दी जाए
'अल्वी' होटल में ठहर सकता है
क्यूँ उसे घर में जगह दी जाए