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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
धरती की बहनें | अनुपम सिंह
मैं बालों में फूल खोंस
धरती की बहन बनी फिरती हूँ
मैंने एक गेंद अपने छोटे भाई
आसमान की तरफ़ उछाल दी है।
हम तीनों की माँ नदी है
बाप का पता नहीं
मेरा पड़ोसी ग्रह बदल गया है।
कोई और आया है किरायेदार बनकर
अब से मेरी सारी डाक उसी के पते पर आएगी
मैंने स्वर्ग से बुला लिया है अप्सराओं को
वे इन्द्र से छुटकारा पा ख़ुश हैं।
आज रात हम सब सखियाँ साथ सोएँगी
विष्णु की मोहिनी चाहे
तो अपनी मदिरा लेकर इधर रुक सकती है…