कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
कभी कभी जीवन में ऐसे भी क्षण आये | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी
कभी कभी जीवन में ऐसे भी कुछ क्षण आये
कहना चाहा पर होठों से बोल नहीं फूटे।
महज़ औपचारिकता अक्सर होठों तक आयी
रहा अनकहा जो उसको, बस नज़र समझ पायी
कभी कभी तो मौन ढल गया जैसे शब्दों में
और शब्द कोशों वाले सब शब्द लगे झूठे
कहना चाहा पर होठों से शब्द नही फूटे।
जिनसे न था खून का नाता, रिश्तों का बंधन
कितना सारा प्यार दे गए कितना अपनापन
कभी कभी उन रिश्तों को कुछ नाम न दे पाए
जीवन भर जिनकी यादों के अक्स नहीं छूटे
कहना चाहा पर होठों से बोल नहीं फूटे।