कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
वे लोग | लक्ष्मी शंकर वाजपेयी
वे लोग
डिबिया में भरकर पिसी हुई चीनी
तलाशते थे चींटियों के ठिकाने
छतों पर बिखेरते थे बाजरा के दाने
कि आकर चुगें चिड़ियाँ
वे घर के बाहर बनवाते थे
पानी की हौदी
कि आते जाते प्यासे जानवर
पी सकें पानी
भोजन प्रारंभ करने से पूर्व
वे निकालते थे गाय तथा अन्य प्राणियों का हिस्सा
सूर्यास्त के बाद, वे नहीं तोड़ने देते थे
पेड़ से एक पत्ती
कि ख़लल न पड़ जाए
सोये हुए पेड़ों की नींद में
वे अपनी तरफ़ से शुरु कर देते थे बात
अजनबी से पूछ लेते थे उसका परिचय
ज़रूरतमंदों की करते थे
दिल खोल कर मदद
कोई पूछे किसी का मकान
तो ख़ुद छोड़ कर आते थे उस मकान तक
कोई भूला भटका अनजान मुसाफ़िर
आ जाए रात बिरात
तो करते थे भोजन और विश्राम की व्यवस्था
संभव है, अभी भी दूरदराज़ किसी गाँव या क़स्बे में
बचे हों उनकी प्रजाति के कुछ लोग
काश ऐसे लोगों का
बनवाया जा सकता एक म्युज़ियम
ताकि आने वाली पीढ़ियों के लोग
जान सकते
कि जीने का एक अंदाज़ ये भी था।