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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
प्रेम समंदर। पल्लवी विनोद
प्रेम समंदर-सा ही है धरती पर
इतना कि सब डूब जाए
इतना कि प्यास ही ना बुझे
इतना कि डूबकर भी उतराता रहे
निकल बाहर फिर इसी में समाता रहे
प्रेम को पाना हो तो मछली बन जाना
सीपी बन जाना,
चाहें बन जाना कोई डूबा जहाज़
अगर मनुष्य बनोगे
तो समंदर आश्चर्य देगा
वैविध्य देगा
गहराई देगा
टापू देगा
बस ख़ुद को नहीं दे पाएगा।