Subscribe
Share
Share
Embed
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
बात यह नहीं है । तेजी ग्रोवर
बात यह नहीं है कि कहीं भी मन नहीं लगता,
कहीं भी जड़ महसूस नहीं होती,
कहीं भी अकेलापन साथ नहीं छोड़ता।
बात ठीक इससे उलट है।
हर जगह मन लगता है।
हर जगह जड़ महसूस होती है।
हर जगह सान्निध्य है, स्नेह है, साथ है।
आत्मीयता से भरे हुए नक्षत्र पर किससे कहूँ
कि ऐसा है...
कौन मेरी बात का विश्वास करेगा?