Pratidin Ek Kavita

एक ख़्वाहिश । सेवक नैयर

और मैं सोचता हूँ

यूँही
उम्र भर

एक कमरे में
शतरंज की मेज़ पर

तुम मुसलसल मुझे
मात देती रहो

मैं मुसलसल यूँही
मात खाता रहूँ

अपनी
तक़दीर पर

मुस्कुराता रहूँ

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

एक ख़्वाहिश । सेवक नैयर

और मैं सोचता हूँ

यूँही
उम्र भर

एक कमरे में
शतरंज की मेज़ पर

तुम मुसलसल मुझे
मात देती रहो

मैं मुसलसल यूँही
मात खाता रहूँ

अपनी
तक़दीर पर

मुस्कुराता रहूँ