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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
पंख दिए आकाश न दोगे | कन्हैयालाल सेठिया
पंख दिए, आकाश न दोगे?
तो जड़ता चेतनता क्या है?
फिर क्षमता-दर्बलता क्या है?
केवल खेल, अगर रचना को-
प्राण दिए, विश्वास न दोगे!
व्यर्थ मृत्यु-जीवन की रेखा,
निष्फल है कटु-मधु का लेखा,
केवल कपट, अगर कोयल को-
कंठ दिए, मधुमास न दोगे!
हृदय-हीन की भाषा कैसी?
मिलन-हीन अभिलाषा कैसी?
कैवल व्यंग्य, अगर लोचन को-
स्वप्न दिए, आभास न दोगे?
पंख दिए, आकाश न दोगे?