Pratidin Ek Kavita

ठाकुर का कुआँ। ओमप्रकाश वाल्मीकि

चूल्हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की

तालाब ठाकुर का।
भूख रोटी की

रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का

खेत ठाकुर का।
बैल ठाकुर का

हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी

फ़सल ठाकुर की।
कुआँ ठाकुर का

पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के

गली-मुहल्ले ठाकुर के
फिर अपना क्या?

गाँव?
शहर?
देश?

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

ठाकुर का कुआँ। ओमप्रकाश वाल्मीकि

चूल्हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की

तालाब ठाकुर का।
भूख रोटी की

रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का

खेत ठाकुर का।
बैल ठाकुर का

हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी

फ़सल ठाकुर की।
कुआँ ठाकुर का

पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के

गली-मुहल्ले ठाकुर के
फिर अपना क्या?

गाँव?
शहर?
देश?