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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
घिसी पेंसिल | रघुवीर सहाय
फिर रात आ रही है।
फिर वक्त आ रहा है।
जब नींद दुःख दिन को
संपूर्ण कर चलेंगे
एकांत उपस्थत हो, 'सोने चलो' कहेगा
क्या चीज़ दे रही है यह शांति इस घड़ी में ?
एकांत या कि बिस्तर या फिर थकान मेरी ?
या एक मुड़े कागज़ पर एक घिसी पेंसिल
तकिये तले दबाकर जिसको कि सो गया हूँ ?