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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
साँप | फ़रहत एहसास
साँप लपेटे घूम रहा हूँ
दुनिया मुझ से ख़ौफ़-ज़दा है
सब मुझ को अच्छे लगते हैं
लेकिन यूँ है
जिस लड़की को चाहा मैं ने
जिस लड़के को दोस्त बनाया
जिस घर में माँ बाप बनाए
जिस मस्जिद में घुटने टेके
सब ने मेरा साँप ही देखा
मुझ को कोई देख न पाया
मैं सब को कैसे समझाऊँ
ये दुनिया का साँप नहीं है
मेरे साथ पला पोसा है
ये मेरा माँ जाया
बस मुझ को डसता है