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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
खाना है । प्रियाँक्षी मोहन
खाना है
"वो" खाना है
क्या खाना है?
घर भर पूछे
बिटिया से
बिटिया को बस
रट लगी
कि "वो" खाना है
कल से
वो क्या होता
ज़रा बताओ?
सब पूछे बिटिया से
बिटिया को तो
नाम न सूझे
कुछ मीठा
मीठा सूझे
टॉफी चॉकलेट
मिश्री, कुल्फी
क्या है वो
इन सब में?
बिटिया मुह फुलाए
दौड़े
इस कोने उस कोने
पापा मम्मी
दादा दादी
सब सो गए
जब थक के
बिटिया कुतरे
चीनी चाटे
नन्ही चीटी के संग में