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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
गवाही। अदनान कफ़ील दरवेश
क़ब्र में
मेरी बगल में ही लिटाना
मेरी कविता को भी
जो मेरी दोस्त रही
मेरे उन यातना के क्षणों में भी
इस तरह हम एक साथ उठेंगे
महशर के रोज़
शुभ दिन बोलते हुए
एक दूसरे को
उसे लिटाना ज़रूर
क्योंकि उसे सबसे बड़ी अदालत में
उस दिन
मेरे ख़िलाफ़ गवाही देनी है।