कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
कोई आवाज़ नहीं। तनवीर अंजुम
अनुवाद: रिचर्ड जे कोहेन
गर्द हमारे घरों तक फैल गई
उस मौसम में कोई बारिश नहीं
हम ने बादल के आख़िरी टुकड़े को गुज़र जाने दिया
अब वो मेरे ना-फ़रमान बेटे की तरह
वापस नहीं आएगा
दुश्मनी हमारे दिलों तक फैल गई
उस रात में कोई करामात नहीं
हम ने पानी को कीचड़ में मिल जाने दिया
अब वो बूढ़े की खोई हुई बीनाई की तरह वापस नहीं आएगा
मौत हमारे जिस्मों तक फैल गई
इन गलियों में कोई आवाज़ नहीं
हम ने ख़ून को सड़कों पर बह जाने दिया
अब वो मेरे बिछड़े हुए ख़ुदा की तरह
वापस नहीं आएगा