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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
मौन । आरती अबोध
अर्धविकसित चेतना के बहेलिए ने
अव्यक्त आकांक्षाओं के मेरे मृग की हत्या कर दी
जिस संग मुझे मरने का सुख भोगना था
उसके न होने का संताप मेरी आत्मा में उतर आया
और इस तरह प्रेम में मेरी भाषा मौन बनकर बही।