Pratidin Ek Kavita

ऐ औरत! | नासिरा शर्मा 

जाड़े की इस बदली भरी शाम को
कहाँ जा रही हो पीठ दिखाते हुए
ठहरो  तो ज़रा!
मुखड़ा तो देखूँ कि उस पर कितनी सिलवटें हैं
थकन और भूख-प्यास की
सर पर उठाए यह सूखी लकड़ियों का गट्ठर
 कहाँ लेकर जा रही हो  इसे?
तुम्हें नहीं पता है कि लकड़ी जलाना, धुआँ फैलाना, वायु को दूषित करना
अपराध है अपराध!
 
गैस है, तेल है ,क्यों नहीं करतीं इस्तेमाल उसे
तुम्हारी ग़रीबी, बेचारगी और बेकारी के दुखड़ों से
कुछ नहीं लेना देना है क़ानून को
बस इतना कहना है कि
जाड़े की ठिठुरी रात में,गरमाई लेते हुए
रोटी सेंकने की ग़लती मत कर बैठना
पेड़ कुछ कहें या न कहें  तुम्हें मगर
इस अपराध पर, क़ानून पकड़ लेगा तुम्हें

यह दो हज़ार चौबीस है
बदलते समय के साथ चलो ,
और पुराने रिश्तों से नाता तोड़ो
सवाल मत करो कि बमों से निकलते बारूद
धूल, धुएँ से पर्यावरण का नाश नहीं होता
पेड़ों के कटने से गर्मी का क़हर नहीं टूटता
यह छोटे मुँह और बड़ी बात होगी।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

ऐ औरत! | नासिरा शर्मा

जाड़े की इस बदली भरी शाम को
कहाँ जा रही हो पीठ दिखाते हुए
ठहरो तो ज़रा!
मुखड़ा तो देखूँ कि उस पर कितनी सिलवटें हैं
थकन और भूख-प्यास की
सर पर उठाए यह सूखी लकड़ियों का गट्ठर
कहाँ लेकर जा रही हो इसे?
तुम्हें नहीं पता है कि लकड़ी जलाना, धुआँ फैलाना, वायु को दूषित करना
अपराध है अपराध!

गैस है, तेल है ,क्यों नहीं करतीं इस्तेमाल उसे
तुम्हारी ग़रीबी, बेचारगी और बेकारी के दुखड़ों से
कुछ नहीं लेना देना है क़ानून को
बस इतना कहना है कि
जाड़े की ठिठुरी रात में,गरमाई लेते हुए
रोटी सेंकने की ग़लती मत कर बैठना
पेड़ कुछ कहें या न कहें तुम्हें मगर
इस अपराध पर, क़ानून पकड़ लेगा तुम्हें

यह दो हज़ार चौबीस है
बदलते समय के साथ चलो ,
और पुराने रिश्तों से नाता तोड़ो
सवाल मत करो कि बमों से निकलते बारूद
धूल, धुएँ से पर्यावरण का नाश नहीं होता
पेड़ों के कटने से गर्मी का क़हर नहीं टूटता
यह छोटे मुँह और बड़ी बात होगी।