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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
पहले बच्चे के जन्म से पहले | नरेश सक्सेना
साँप के मुँह में दो ज़ुबानें होती हैं।
मेरे मुँह में कितनी हैं
अपने बच्चे को दुआ किस ज़ुबान से दूँगा
खून सनी उँगलियाँ
झर तो नहीं जाएँगी पतझर में
अपनी कौन-सी उँगली उसे पकड़ाऊँगा
सात रंग बदलता है गिरगिट
मैं कितने बदलता हूँ
किस रंग की रोशनी का पाठ उसे पढ़ाऊँगा
आओ मेरे बच्चे
मुझे पुनर्जन्म देते हुए
आओ मेरे मैल पर तेज़ाब की तरह!