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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
जीवन की जय। मैथिलीशरण गुप्त
मृषा मृत्यु का भय है,
जीवन की ही जय है।
जीवन ही जड़ जमा रहा है,
निज नव वैभव कमा रहा है,
पिता-पुत्र में समा रहा है,
यह आत्मा अक्षय है,
जीवन की ही जय है!
नया जन्म ही जग पाता है,
मरण मूढ़-सा रह जाता है,
एक बीज सौ उपजाता है,
स्रष्टा बड़ा सदय है,
जीवन की ही जय है।
जीवन पर सौ बार मरूँ मैं,
क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं,
यदि न उचित उपयोग करूँ मैं,
तो फिर महा प्रलय है,
जीवन की ही जय है।